Aug 22, 2026, 11:40
भारत के पड़ोसी देशों के साथ जल विवाद अब सिर्फ नदियों के पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं दिख रहे हैं। एक तरफ पाकिस्तान सिंधु जल संधि को लेकर भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ बांग्लादेश गंगा जल संधि के नवीनीकरण और तीस्ता परियोजना को लेकर अपनी मांगें तेज कर रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या दक्षिण एशिया में भारत के खिलाफ 'वॉटर डिप्लोमेसी' का नया दौर शुरू हो रहा है?
सिंधु पर पाकिस्तान का दबाव
भारत ने सिंधु जल संधि को फिलहाल 'abeyance' में रखने का अपना रुख कायम रखा है और कहा है कि पाकिस्तान को सीमा पार आतंकवाद के समर्थन से विश्वसनीय और स्थायी रूप से दूरी बनानी होगी।
इसके जवाब में पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह आरोप लगा रहा है कि भारत पानी को 'हथियार' बना रहा है। पाकिस्तान ने संधि के तहत अपने जल अधिकारों की रक्षा के लिए उपलब्ध कूटनीतिक और कानूनी रास्तों का इस्तेमाल जारी रखने की बात कही है।
यानी सिंधु का पानी अब भारत-पाकिस्तान रिश्तों में सिर्फ जल संसाधन नहीं, बल्कि रणनीतिक दबाव का मुद्दा भी बन चुका है।
तीस्ता और गंगा पर बांग्लादेश की नई रणनीति
बांग्लादेश की तरफ से भी पानी को लेकर तेवर सख्त हुए हैं। गंगा जल संधि के नवीनीकरण से पहले ढाका ने 'गारंटी क्लॉज' की मांग उठाई है और जरूरत पड़ने पर मामला संयुक्त राष्ट्र तक ले जाने की
बात कही है। भारत और बांग्लादेश के बीच इस मुद्दे पर तकनीकी स्तर की बातचीत जारी है।
वहीं तीस्ता नदी के व्यापक प्रबंधन और पुनरुद्धार परियोजना को लेकर चीन की संभावित भूमिका भी भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय बन सकती है। हालांकि बांग्लादेश ने हाल में स्पष्ट किया है कि वह तीस्ता परियोजना के कारण भारत के साथ अपने मैत्रीपूर्ण संबंध खराब नहीं करना चाहता।
क्या पाकिस्तान और बांग्लादेश एक साथ मोर्चा बना रहे हैं?
फिलहाल ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भारत के खिलाफ कोई
औपचारिक संयुक्त 'वॉटर फ्रंट' बनाया है। लेकिन दोनों देशों के जल मुद्दों में एक समान पैटर्न जरूर दिखाई देता है—भारत के साथ द्विपक्षीय बातचीत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों और बड़े भू-राजनीतिक साझेदारों का सहारा लेना।
पाकिस्तान के मामले में चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। विश्लेषणों के मुताबिक इस्लामाबाद सिंधु विवाद में चीन को अधिक सक्रिय रूप से शामिल करने की कोशिश कर रहा है।
भारत के लिए असली चुनौती क्या है?
भारत के सामने चुनौती सिर्फ पानी की नहीं, बल्कि पानी + कूटनीति + भू-राजनीति के त्रिकोण की है।
अगर सिंधु, गंगा और तीस्ता जैसे मुद्दे एक साथ अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनते हैं, तो भारत को हर मोर्चे पर अपने जल अधिकारों, मौजूदा समझौतों और परियोजनाओं की कानूनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
साथ ही भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पड़ोसी देशों के साथ जल सहयोग के रास्ते पूरी तरह बंद न हों। क्योंकि नदियां सीमाओं से नहीं रुकतीं—और दक्षिण एशिया में जल सुरक्षा आने वाले वर्षों में विदेश नीति का बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है।
निष्कर्ष: पाकिस्तान और बांग्लादेश के कदमों को अभी एक संगठित भारत-विरोधी 'वॉटर फ्रंट' कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन सिंधु से लेकर गंगा और तीस्ता तक पानी से जुड़े विवादों का बढ़ता अंतरराष्ट्रीयकरण भारत के लिए निश्चित रूप से एक नई कूटनीतिक चुनौती है।